भाकपा माले महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि चुनाव आयोग ने एसआईआर को लेकर उठते सवालों का कोई जवाब नहीं दिया बल्कि फाइनल लिस्ट से और ज्यादा सवाल पैदा हो रहे हैं।
उन्होंने पटना में संवाददाता सम्मेलन में कहा कि एसआईआर की फाइनल लिस्ट जारी होने के बाद गड़बड़ियों और खतरों की संख्या और बढ़ गई है। आयोग के आँकड़े खुद ही कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि पहले आयोग ने 65 लाख लोगों के नाम काटे थे। अब और 3 लाख 66 हजार नाम काट दिए गए। कुल मिलाकर संख्या और बढ़ गई। यानी 65 लाख से घटकर 47 लाख होना असली तस्वीर नहीं है। कुल मिलाकर नाम काटने का दायरा और बढ़ा है।
उन्होंने कहा कि की गई शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई उसपर आयोग कुछ नहीं कह रहा है.
भट्टाचार्य ने कहा कि महिला मतदाताओं के नाम अधिक काटे गए हैं। जनवरी 2025 में महिलाओं का अनुपात 914 था, अब घटकर 892 हो गया – यानी 22 अंकों की गिरावट! महिलाएं पुरुषों की तरह पलायन नहीं करतीं, तो फिर महिलाओं के नाम क्यों गायब हुए? क्या यह कर्ज के बोझ के कारण महिलाओं द्वारा घर-द्वार छोड़ देने के कारण हुआ है?
उन्होंने कहा कि अचानक 6000 लोगों को “नागरिकता संदिग्ध” बता दिया गया। जब 65 लाख नाम काटे गए तब ऐसा कोई नाम नहीं था। 2019 में पूरे देश में सिर्फ 4 ऐसे मामले आए थे, बिहार में तो एक भी नहीं था। अब ये 6000 लोग कहाँ से आ गए? यह भी स्पष्ट नहीं है.
माले महासचिव ने कहा कि मरे हुए लोगों के नाम काटने की अजीबोगरीब गड़बड़ी हुई है। अब लोग आवेदन देकर कह रहे हैं कि “हम मर गए हैं, हमारा नाम काट दो।” यह कैसी प्रक्रिया है? यह कौन सी बात है।
उन्होंने मांग की कि चुनाव आयोग इन सवालों पर तत्काल स्पष्टीकरण दे। उन्होंने आरोप लगाया कि एसआईआर की फाइनल लिस्ट की यह गड़बड़ी देश के मतदाताओं को संदेह और असुरक्षा में धकेल रही है और कहा कि चुनाव आयोग के साथ आने वाली बैठक में हम इन सभी सवालों को उठाएंगे।
भट्टाचार्य ने बताया कि उनके नेतृत्व में पार्टी की एक उच्चस्तरीय जांच टीम ने 2 अक्टूबर को भागलपुर जिले के पीरपैंती का दौरा कर वहां की स्थिति का निरीक्षण किया। टीम ने उन किसानों से विस्तृत बातचीत की जिनकी जमीन पावर प्लांट के नाम पर अधिग्रहित की जा रही है। जांच दल ने पीरपैंती नगर पंचायत के सुंदरपुर और कमालपुर गांवों के किसानों से लंबी चर्चा की और उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना।
उन्होंने कहा कि पूरे इलाके में लोगों का कहना है कि यह जमीन आम के बगीचों के बीच स्थित है और इसके कारण लाखों पेड़ काटे दिए जाएंगे। पावर प्लांट का सब्जबाग दिखाकर सच्चाई छुपाई जा रही है। लोग बताते हैं कि उन्हें पहले से ही रोजगार मिल रहा है – आम के बगीचे लाखों परिवारों को आजीविका प्रदान करते हैं। जिनके पास जमीन है और जिनके पास नहीं है – दोनों को यहाँ रोजगार मिलता है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों को उनकी जमीन, रोजगार और आजीविका से बेदखल करके अडानी को लाभ पहुँचाना मोदी व नीतीश सरकार की साजिश है। लोग बहुत नाराज हैं।
उल्लेखनीय है कि अडानी को 1 रुपये की सालाना दर से 1050 एकड़ जमीन पावर प्लांट के नाम पर लीज पर दी जा रही है।
(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)